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​​संघर्ष की राह पर

BY : MB

हाथरस में पहली जनसंसद

महाशिवरात्रि, 10 मार्च, 2013 मौलिक भारत के लिए एक ऐतिहासिक दिन बन गया। अपने पिछले चार माह के मंथन, चिंतन, दर्शन व कार्ययोजना को जमीन पर उतारने के लिए मौलिक भारत के जुझारू व समर्पित कार्यकर्ताओं की टोली संघर्ष के कठोर धरातल पर उतर गई। संघर्ष का पहला पड़ाव बनी पश्चिमी उत्तर प्रदेश के एक पिछड़े क्षेत्र हाथरस की धरती। इस सांस्कृतिक-धार्मिक नगरी में हमारी टोली का अभूतपूर्व स्वागत हुआ। चेतन समाज व आमजन सभी ने हमें हाथों हाथ लिया। हमारी स्थानीय इकाई की सक्रियता व गतिविधियां प्रशंसनीय थी। हमारी पहली ‘जनसंसदÓ का आयोजन भी स्थानीय लोगों के लिए अचरज भरा था। यह सामान्य आयोजनों से अलग था। हम लोग न तो फालतु की भविष्यवाणी कर रहे थे और न ही अपनी-अपनी दुकान चला रहे थे। पूरा कार्यक्रम आपसी परिचय, सहभाग और पारस्परिक संवाद पर आधरित था। उद्देश्य भी स्पष्ट थे। राष्ट्र की समस्याओं की जड़ों से लोगों को जोडऩा, अपनी गलतियों को जानना व सुधारना, हाथरस जिले की मूल समस्याओं को पहचानना, व्यवस्था की निष्क्रियता को तोडऩे की रणनीति बनाना और हाथरस जिले की समस्याओं को समझने, जानने व उनसे निवारण के लिए सतत् संघर्ष के लिए जनसंसदों का निर्माण पंचायत, ब्लॉक व जिला स्तर पर करना। इस प्रक्रिया में जिले के सभी जागरूक लोगों को जोडऩे हेतु एक संचालन समिति का गठन करना। सुखद यह रहा कि हम सभी लोगों ने मिलकर यह कार्य पूरा कर लिया। हमारी अनुसंधान टोली ने पूरे जिले के कृषि, उद्योग, यातायात, जल व्यवस्था, नगर योजना, ग्रामीण अर्थव्यवस्था, कृषि, रोजगार, शिक्षा व स्वास्थ्य का पूरा खाका उसकी कमियाँ व उन्हें दूर करने के उपायों की व्यवस्थित जानकारी स्थानीय समिति को दे दी। साथ ही देश भर के मीडिया व्यवस्था से जुड़े अंगों व प्रबुद्ध लोगों तक इन सूचनाओं को पहुँचाया गया। उत्तर प्रदेश के दो लाख करोड़ से अधिक के बजट में हाथरस जिले का हिस्सा मात्र 28 करोड़ जानकर अत्यंत क्षोभ भी हुआ और शासकों की असंवेदनशीलता पर गुस्सा भी आया। हम अपने आक्रोश को एक व्यवस्थित व लोकतांत्रिक रूप से आंोलन में परिवर्तित करने हेतु पूरे हाथरस जिले में और इसी प्रकार पूरे देश में नेतृत्व के गुणों व प्रशासनिक क्षमता से युक्त नया नेतृत्व विकसित करने का प्रयास कर रहे हैं। हम जनसंसदों के आयोजन से स्थानीय, क्षेत्रीय व राष्ट्रीय अपेक्षाओं को नीतिपत्र के रूप में व्यवस्थित कर जनघोषणा पत्र तैयार करते जाएंगे ओै इन मांगों को मनवाने के लिए संघर्ष कर नये साखयुक्त नेतृत्व का विकास करते जाएंगे। जनसंसद, जनघोषणापत्र ओर जननेताओं की श्रृंखला स्थापित होने के उपरान्त ही ‘मौलिक भारतÓ सम्पूर्ण राष्ट्र में आमूलचूल परिवर्तन एवं नवनिर्माण का बिगुल बजा सकता है ओर राजनीतिक परितर्वन की दिशा में बढ़ सकता है।

दूसरे चरण की ओर …
तीन फरवरी, 2013 से प्रारंभ हुए आंदोलन ‘मौलिक भारतÓ को अब लगभग छह माह हो चुके हैं। आंदोलन की स्थापना के साथ ही संकल्पना, वैकल्पिक नीतियों का निर्माण, दृष्टिकोण प्रपत्र, संगठन का स्वरूप एवं कार्ययोजना सभी का ढांचा तैयार होता गया है। अभी तक 20 से अधिक छोटी-बड़ी बैठकों व कार्यक्रमों का आयोजन किया गया है। इस चिंतन व मंथन से मौलिक भारत का जो स्वरूप निकल कर आया है वह कुछ इस तरह का है- द्य राष्ट्र प्रथम: मौलिक भारत एक भारतीयता से ओतप्रोत राष्ट्रवादी आंदोलन है तथा हम अन्तर्राष्ट्रीयता का विरोध नहीं करते किन्तु प्रत्येक स्तर पर भारत के ज्ञान, विज्ञान, संस्कृति, योग व अध्यात्म की प्रधानता के अनुरूप विदेश नीति के पक्षधर है। हम राष्ट्र की समृद्धि व मानव संसाधनों की निकासी की नीतियों के विरुद्ध हैं तथा राष्ट्रहित में राष्ट्र के सभी संसाधनों के प्रयोग के पक्षधर हैं। राजनीतिक जागृति का सामाजिक आंदोलन मौलिक भारत सीधे राजनीतिक लड़ाई का आंदोलन नहीं है। हम तीन स्तरों पर कार्य करने जा रहे हैं- प्रथम – वैकल्पिक नीतियों के निर्माण व वर्तमान नीतियों की समीक्षा के लिए चिंतक समूह के रूप में। द्वितीय – वैकल्पिक कार्यक्रमों के प्रचार-प्रसार के लिए जनजागरण हेतु देश भर में मौलिक चिंतन जन संसदों का आयोजन। तृतीय – देश भर में ‘मौलिक भारतÓ के चिंतन के अनुरूप मानसिकता वाले नेतृत्व व समर्थकों का ढांचा खड़ा करना। द्य स्पष्ट व पारदर्शी आर्थिक स्रोत- ‘मौलिक भारतÓ अपने सदस्यों की सहायता एवं अंशदानों से पल्लवित होने वाला आंदोलन है और हम किसी बाहरी विदेशी, राजनीतिक अथवा अदृश्य स्रोतों से संचालित आंदोलन नहीं हैं। द्य विदेशी फंडिंग व राजनीतिक दलों से परे हम न तो किसी विदेशी फंडिंग का समर्थन करते हैं और न ही किसी राजनीतिक दल की कठपुतली हैं। हम निरंतर सत्ता की राजनीति से पर सत्य को सामने रख राष्ट्रहित में परिस्थितियों का अवलोकन कर तटस्थ दृष्टिकोण सामने रखने के लिए दृढ़संकल्पित हैं। द्य हमारे साथ विविध क्षेत्रों में कार्य करने वाली संस्थाएं, समूह व एनजीओ जुड़े हैं जिनकी विचारधाराएं व कार्यशैली अलग-अलग हैं किन्तु वे इसी शर्त पर हमारे साथ हैं कि उनकी नीतियाँ ‘राष्ट्र प्रथमÓ की प्राथमिकता पर आधारित हैं। द्य हम सामूहिक नेतृत्व की अवधारणा, सबकी सहमति, सबके विचार व सुझावों को आत्मसात करने की नीति पर चलते हैं। द्य हम ऐसे किसी व्यक्ति को सदस्य के रूप में स्वीकार नहीं करते जो आंदोलन का उपयोग व्यक्तिगत स्वार्थों की पूर्ति अथवा निजी महत्वाकांक्षा को निबटाने में करें। द्य हम किसी भी राजनीतिक दल, चिंतन, विचारधारा अथवा समूह के विरुद्ध खड़े नहीं हुए हैं वरन हम अद्यतन और समग्र रूप से मौलिक हैं। यद्यपि हमारी कोशिश है कि हमारा दृष्टिकोण पत्र देश के प्रत्येक दल, समूह, संगठन, सिविल सेवकों व समाजसेवियों तक पहुँचे और वे इसे समझें, मानें व स्वीकारें।

प्रिय मित्रों,

वन्दे मातरम!
आपसे मुखातिब होते हुए अत्यन्त हर्षित महसूस कर रहा हूँ। मैं आनंदित हूँ कि भौतिकता की अंधी दौड़ के बीच उपभोकतावाद की दीवारों को तोड़ राष्ट्र के प्रति समर्पित योग्य लोगों का समूह मेरे साथ है। मैं आपसे प्रेरित हूँ और निरंतर सीखता रहता हूँ। अपने-अपने क्षेत्र में आप सभी लोग श्रेष्ठतम कर मानवजाति एवं प्रत्येक भारतीय के सम्पूर्ण कल्याण के लिए निरन्तर संघर्ष करते हुए राष्ट्र निर्माण के यज्ञ में अपनी आहूति दे रहे हैं।

मित्रों, ‘मौलिक भारतÓ आंदोलन के दूसरे चरण का श्रीगणेश करने का समय आ गया है। अब समय ‘कार्यवाहीÓ व निचले स्तर पर सक्रियता का है। ऐसे में कुछ सूत्र हम गांठ बांध लें तो सभी के लिए श्रेयष्कर होगा। द्य प्रथमत: हमें समझना होगा कि मौलिक भारत क्या है और हम इससे क्यों जुड़े। मित्रों मौलिक भारत बनाने की आवश्यकता क्यों पड़ी, यह समझना भी जरूरी है, तभी हम नये लोगों को यह समझा पायेंगे। अत: मौलिक भारत का प्रपत्र जो आपको भेजा गया है ध्यान से पढ़ें।

द्वितीय, हमारी अपनी सक्रियता एवं भागीदारी का प्रश्न है। हमें निश्चय करना होगा कि हम इस आंदोलन का कितना समय, किस रूप में दे सकते हैं और अगर नहीं तो अप्रत्यक्ष रूप से हम क्या सहयोग दे पायेंगे। द्य तृतीय, यह समझना जरूरी है कि हम ‘सम्पूर्ण व्यवस्था परिवर्तनÓ के कठिन लक्ष्य पर हैं और इसे पाने के लिए लंबा संघर्ष करना पड़ सकता है। क्या हम मानसिक रूप से इसके लिए तैयार हैं।

अंतिम, अब हमारी सक्रियता का समय है, यह सक्रियता किस प्रकार से हो, हम क्या-क्या कार्यक्रम करें व कैसे करें जिससे न सिर्फ हमारा संगठन विस्तार हो सके वरन हमारे उठाये मुद्दे जन-जन की आवाज बन सके, इस पर आपके सुझाव आमंत्रित हैं।

आपके उत्तर की प्रतीक्षा में आपका अपना
पवन सिन्हा
(राष्ट्रीय संयोजक)​

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